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मैथिली कथाः धुनिक भीतर

सुजीतकुमार झा ।

‘काठमाण्डूक लोक बहुत ठग होइत अछि ने अंकल ?’ प्राची पुछलक । शायद हम ओकरा कहि पबितहुँ, नहि बेटी मनुष्य सभठाम सामान होइत अछि । काठमाण्डूकेँ हुए वा वीरगञ्जकेँ । अमेरिकाकेँ हुए वा लण्डनकेँ । हमर स्कूल मास्टरबला वुद्धिसँ प्राचीकेँ बुझाएब उचित छल, वास्तविक चीज होइत अछि विश्वास । मनुष्यक उपर मनुष्यक विश्वास रहएकेँ बात अछि । जखन मनुष्यक उपर मनुष्यक विश्वास टुटि जाइत अछि, ई धरती सही मानेमे धरती नहि रहि जाइत अछि । मुदा हम कहि नहि पेलहुँ । प्राचीकेँ अंकलबला आवाज लगेमे अटैक गेल । अंकल ! जेना की ओकर बड़का बाबूजी नहि होइ । ओकर बाबू परमेश हमर छोट भाइ होइत अछि । ओ हमर किछु नहि अछि । ई बात सत्य अछि प्राचीक सँग हमर घनिष्ठता मात्र दू दिनक अछि । गामक माटिकेँ कहिओ, ओ छुनए नहि अछि । ओकरा मूल रुपसँ मैथिल नहि कहल जा सकैत अछि । ओकर १२ बर्षक स्मरणमे हमर कोनो स्थान नहि अछि । शायद ओकर आगा बड़का बाबूजीक स्थान अंकलक रुपमे ग्रहणीय छल ? काल्हि हम आ प्राची भक्तपुर गेल छलहुँ । परमेश पूरे व्यवस्था कऽ देने छल । बात भेल छल भक्तपुरक अतिरिक्त ललितपुरक धार्मिक स्थलसभकेँ घुमाबएकेँ मुदा बस काठमाण्डूसँ अबेरसँ निकललाक कारण भक्तपुर मात्र घुमा सकल । हमरा कहल गेल छल निर्दिष्ट चौक लग भोर ८ बजे ठाढ़ होएबाक लेल मुदा बस १२ बजे आएल आ फेर अन्य टुरिष्टसभकेँ लेबए एयरपोर्ट चलिगेल । ओहिमे अबेर भऽ गेल छल । भक्तपुरसँ आबएमे बहुत राति भऽ गेल । आइ फेर भोर ८ बजेक बस छल, काठमाण्डूक भ्रमणक । हमरासँग प्राची छल । परमेश पूरे प्रबन्ध कऽ देने छल । बात भेल छल नजदिके रहल चौकसँ बस पकरएकेँ । काल्हिक दिनक अभिज्ञतासँ प्राची प्रश्न कएलक, ‘काठमाण्डूक लोक बहुत ठग होइत अछि अंकल ?’ ‘नहि तेहन बात नहि अछि ।’ ‘मम्मी तऽ कहैत अछि, ओ ककरो पर विश्वास नहि करैत अछि ।’ प्राचीक मम्मी कहिओ हमरासँग दुव्र्यवहार नहि कएलीह । भलेही हमरा देखि कऽ माथ नहि झापैत छलीह, सीधे मुहँ हमरासँ बात करैत छलीह मुदा कहिओ दुव्र्यवहार नहि कएलीह । हुनकर व्यवहार हरेक समय भद्र छल, बातचित हरेक समय मधुर । मुदा पता नहि किए, हम हुनका आगा सहज नहि भऽ पबैत छलहुँ ? हुनकर फेशनक लेल ? स्टाइलक लेल ? बाहर जाइत समय ओ सलवार कुर्ती पहिरैत छलीह । घरमे रहैत समय पेन्ट आ लम्बा गन्जी । शायद प्रेमाकेँ ई सभ बात पसिन नहि आबि रहल छलन्हि । एहि सभमे ओ व्यवहार कुशलताक अभाव देखैत छलीह । मुदा हमरा ई सभ बात कनिको खराब नहि लगैत छल । भावहु यदि फेशन करए चाहैत छथि तऽ करौथु, मुदा शायद हमर गुञ्जा बाहर रहला पर एहने फेशन करए ? तैयो परमेशक कनियाँक आगा हम सहज नहि भऽ पेलहुँ । स्वयंकेँेँ छोट अनुभव करए लगलहुँ । हमर देहातीपन, हमरा संकुचित करए लागल । आब हम देखि रहल छलहुँ, परमेशक लग सेहो हमरा सहज नहि लागि रहल छल । कतए गेल ओ परमेश, जे हमरा आगा मुहँ खोलि कऽ बात नहि कऽ पबैत छल । काठमाण्डू जाएसँ पूर्व कतेक रुपैयाक आवश्यकता पड़त, ओ सीधा हमरा नहि कहि भौजीक माध्यमसँ कहबैत छल । वएह परमेश आब कोन आत्मविश्वासक सँग हमर आगा ठाढ़ होइत अछि, जखन की हमरा ओकर आगा जाएकेँ साहस नहि होइत अछि । मुदा किए ? परमेश हमरासँ सात बर्षक छोट अछि । ओकरा आ हमरा बीच एकटा बहिन अछि । हम घरमे बड़का बेटा छलहुँ । छोट रही तऽ परमेशकेँ बहुत खौझबैत छलहुँ तखन ओ कानि–कानि कऽ बाबूजीसँ बात सुनबैत छल । एकदिन बाबूजी तऽ एतेक डटलन्हि जे पूरे दिन डरक कारण बाहर आम गाछीमे घुमैत रहलहुँ । बच्चाक मीठ–मीठ बात । परमेशकेँ माछ पकड़एकेँ सख । नहाइत समय काटमे माछ पकडि़ कऽ अनैत छल । हमरा गाममे एकटा पनि छल । पनि हमर घरे नजदिके बाटे बहैत छल । ओ पनिमे पोठिया, गरैइ, गरचुन्नी माछ कुदैत रहैत छल । खेल–खेलमे परमेश दौड़ कऽ पनिमे जाइत छल आ दुनू हाथसँ माछ पकडि़क आनि लैत छल । सभ कहैत छल ओहि जन्ममे ई मल्लाह छल । परमेश बच्चेसँ बहुत फेशन करैत छल । ओ माँकेँ अति प्रिय छल । हमरा एसएलसी पास करएधरि अपना लग कोनो पैसा नहि रहैत छल । पाकेटमनी, हाथक खर्चक प्रश्ने नहि उठैत छल । मुदा बच्चेसँ परमेशकेँ चुकिआ छल । ओ चुकिआमे कतहुँसँ पैसा लऽ कऽ रखैत छल । आवश्यक पड़ला पर ओ, ओहिमेसँ माँकेँ उधारो दैत छल । परमेशक सँग हमरा कतेको बातक मेल नहि खाति छल । ओ बच्चेसँँ अपन कपड़ा, चेहरा, माथक केश सभ प्रति बहुत जागरुक छल । हम नहि छलहुँ । ओकर अपन किछु चीज छल आ ओ ओहिसभ समानकेँ बहुत सम्हारि कऽ रखैत छल । ओकर अपन ओछाएन, चादैर तकिआ एतएधरि की एकटा छोट रेडियो सेहो छल । हमरा किछु नहि छल । हम कोनो चीजक लेल प्रयास नहि करैत छलहुँ । हम अपन कपड़ा स्वयं पसिन नहि करैत छलहुँ आ नहि अपन ओछाएन । कतेको बेर तऽ कोनो चौकीओ हमर नहि रहैत छल । एकबेर गामक नजदिकक शहरमे मेला लागल छल । मौतक कुवा सेहो देखाओल जाइत छल । हम जाति समय टिकटक पैसाक अतिरिक्त एक पैसा बेसी नहि मँगलहुँ मुदा परमेश जाइत समय बटखर्चा सेहो मँगने छल आ माँ देनहो छल । कतेकबेर परमेशक पैसा मँगला पर माँ बाबूजीसँ झगड़ा सेहो कएने छल । परमेश माँकेँ चहेता छल आ हम बाबूजीकेँ चहेता । ‘डैडी कहैत छल अहाँ बहुत पढैÞत छलहुँ । एसएलसी परीक्षामे जिल्ला फस्ट भेल रही । अहाँ डैडी जेकाँ हाकिम नहि बनि गामक स्कूलमे शिक्षक किए बनि गेलहुँ ?’ प्राचीक ई प्रश्नसँ हम फेर फिर्ता चलि अएलहुँ, काठमाण्डू शहरक बालाजू बस स्टैण्ड लग । ओतए ओ बस नहि देखलहुँ । हमर बसक नाम छल पशुपति यात्रा । दिनक ९ बाजि गेल छल । प्रचण्ड गर्मी लागि रहल छल । प्राची वाटर वोतल अपनासँग रखने छल । परमेशक कनियाँ बहुत होसियार आ हिसाबी छलीह । बेरियाक लेल जलपान, बाटक लेल पानि । परमेश जेकाँ ओहो बहुत साफ सुथरी, घरकेँ बुहत बढि़यासँ सजा कऽ रखैत छलीह । हरेक दिन घरमे झाडु पोछा लगबैत छलीह । हम पहिने कहिओ एहिबात पर ध्यान नहि रखैत छलहँु जे हमरा गाममे हमर कनियाँ एहि तरहे सफाई करैत छथि वा नहि । हँ दिआवातीक समय घर धो कऽ साफ करैत हम हरेक बेर देखैत छी । ‘अहाँ गामक स्कूलमे शिक्षक किए बनलहुँ ?’ परमेशक तुलनामे हम एकटा बढि़या विद्यार्थी छलहुँ । ओहि समय अवजेक्टिभ टाइपक प्रश्न नहि होइत छल । आइ काल्हिक बच्चाक जेकाँ एक सयमे ९०÷९५ नम्बर नहि देखल जाइत छल । १ सयमे ६०÷६५ नम्बर लाएब सेहो कठीन काज होइत छल । ओहि समयमे हम १ सयमे ८० मार्क अनने छलहुँ । मुदा किओ सोचने नहि छल, हम बड़का कलेजमे पढ़ी । हमरा मोनमे कहिओ ई बात नहि आएल छल अस्कल, त्रिचन्द्र कलेजमे पढ़ी । गामक लगक कलेजमे पढ़ने छलहुँ । आइएससीक बाद बिएस्सी नहि छल । कहिओ किओ हमरा मेडिकल पढ़ए पड़त बतौने नहि छल । हम विएस्सी सेहो नहि कएलहुँ । किओ कहने छल । विज्ञान लऽ कऽ ग्रजुएट होबएमे कोनो फाइदा नहि । सहीमे हमरा घरमे ईन्जिनियर वा डाक्टर होबएकेँ किओ सोचने नहि छल । ककरो एतेक पढ़ए लेल जतेक पैसाक आवश्यकता पड़त ओतेक पैसा देवाक सामथ्र्य माँ बाबूजीमे नहि छल । हमर गाम पूरे बैक वार्ड जेकाँ छल । नजदिक कोनो कलकारखाना नहि छल । लोककेँ प्रमुख व्यावसाय खेतीपाती करब छल । गाममे बहुत दिन धरि नोकरी करएसँ लोक बुझैत छल, स्कूलक मास्टरी । नहि भेला पर पञ्जाब कमाएब । बड़का लोक कुशल मंगल पुछए समय कहैत छल, तो आइकाल्हि कोन स्कूलमे काज करैत छएँ ? परमेश ओहि समय अधिकृत भऽ गेल छल । हमरा जिलामे ई एकटा नव बात छल । हाकिम होबएकेँ लेल कोन परीक्षा पास करए पड़ैत अछि, लोककेँ पत्ता नहि छल । कतेको गोटे आश्चर्यसँ पुछैत छलाह, ‘हाकिमक पढ़ाई कतए होइत अछि बेटा ?’ परमेश बच्चेसँ स्मार्ट छल । सँगहि उत्तर देलक,‘ काठमाण्डूमे ।’ ‘की–की पढ़बैत अछि ?’ ‘पहिल पाठ होइत अछि, अहाँ हाकिम छी । दोसर जेकाँ नहि । कोना बैसब, कोना खोखब, कोन तरहे बातमे पोल्टिक्स मिला कऽ बाजब ।’ परमेशक व्यङ्ग सेहो गामबलासभकेँ बहुत सुखद लागि रहल छल । परमेश एहन लोक अछि । हमरासँ अलग । हम लोकक आगा सहज नहि भऽ पाबि रहल छलहुँ मुदा ओकरा कोनो लज्जा नहि होइत छल । परमेश एसएलसी द्वितीय श्रेणीमे पास कएलक । पहिल श्रेणीकेँ लेल पाँच प्रतिशत नम्बर बाँकी छल । हम ओहि समय गामक स्कूलमे ज्वाइन कऽ लेलहुँ । परमेश जीद्द कएलक । ओ नजदिकक कलेजमे नहि पढ़ब, ओ बड़का कलेजमे पढ़त । बाबूजी आगि बबुला भऽ गेलाह । ओहि समय बाहर पढ़एमे एक हजार रुपैया खर्च अबैत छल । एतेक पैसा केँ देत ? आइसँ तीस बर्ष पुरान बात अछि । हमरा पाँच सय रुपैया तलब भेटैत छल । बाबूजीकेँ कहलहुँ, ‘पैसा घटलापर हमरा तलबमेसँ सेहो परमेशकेँ दऽ देब ओकरा बाहर जाए दिऔक ।’ परमेश काठमाण्डू गेल पढ़ाई करए लागल । नम्बर कम होबएकेँ कारण साइन्समे एडमिशन नहि भेल । एक हजारसँ ओकर दिनचर्या नहि चलि रहल छल । बादमे ओ टियुशन सेहो पढ़ाबए लागल । परमेशकेँ टियुशन पढ़ाबएबला बात सुनि बाबूजी बहुत दुःखित भेलाह । बाबूजीक बहुत बात हम नहि बतौने छलहुँ जेना परमेश काठमाण्डू जा कऽ सिगरेट पीबसिख लेने छल, बीच—बीचमे दारुओ पीबैत अछि । एकबेर हम पढ़ाईक टेबुल पर सिगरेट देखने छलहुँ । ओहि समय धरि ओ दायित्व सम्पन्न नहि भेल छल । परमेशक ओ सभ रुपढंग देखि कऽ चुप्प रहब उचित बुझलहुँ । परमेश बुझि रहल छल ओकरा नोकरी नहि भेटत । ओकर अनिश्चय भविष्य निराश करए लागल छल । ओ कविता लिखब आरम्भ कएलक । दू तीनटा लड़कीसँ प्रेम करए लागल । जखन मोन करैत छल शारीरिक सम्बन्ध बना लैत छल । एक दूबेर तऽ वेश्यालयसभमे सेहो गेल । ओ बुझि नहि पाबि रहल छल, ओकर प्रत्येक काजकेँ हमरा जानकारी अछि । हम कोना बुझैत छी ? कहिओ कोनो मित्रसँ, कहिओ परमेश लग आबए बला चिठ्ठीसँ, कहिओ परमेशकेँ सामानसभसँ मुदा परमेशकेँ तऽ हमर निगरानी हरेक समय छल जेना की ओ हमर छोट भाई नहि भऽ हमर बेटा हुए । मुदा माँ ई बात मानए लेल तैयार नहि छल । ओ सोचैत छल, हम परमेशसँ ईष्र्या करैत छी । एहिद्वारे बेर—बेर भूmठफुसक बात करैत छी । बाबूजीकेँ कहब हमरा लेल सम्भव नहि छल । ओ तामसमे आबि कऽ परमेशकेँ पिट दैत छलाह । आखिर नीरबतामे सभ चीजकेँ छोडि़ कऽ आओर कोनो उपाय नहि छल । शायद माँक बात सही छल । ओ कहैत छल, मिलाबटकेँ बिना कोनो सोनकेँ गहना नहि बनाओल जा सकैत अछि । एहिद्वारे मनुष्यकेँ चरित्रमे कोनो बढि़या संस्कार आ किछु खराब संस्कार रहब आवश्यक अछि । परमेशक चरित्रक पूरे स्खलन स्वतः धोआ गेल, ओकरा अधिकृत होबएकेँ खबरि सुनि कऽ । बाबूजी प्रशन्न छलाह, माँ सेहो बहुत । हमर तऽ गर्वसँ छाती चौड़ा भऽ गेल छल । राताराति गामबलाक आँखिमे हमर सभक सम्मान बढि़ गेल छल । लोक हमरासभकेँ बड़का लोकक श्रेणी देबए लागल । गामक स्कूलक संचालक समितिक अध्यक्ष देखाई देला पर पहिने हमरा नमस्कार कऽ चलि गेलाह । परमेश नीचा खसैत–खसैत एकहि छलाङ्गमे सभकेँ उपर कुदि कऽ उपर उठि गेल छल । बुढ़ानिलकण्ठ लग बस रुकल । प्राचीक लेल बुढ़ानिलकण्ठ नव नहि छल । हम उमेरक ओहि ढलानधरि पहुँच गेल छलहुँ जतए पहुँचलाक बाद नव चीजमे आकर्षण नहि होइत छल । कोल्ड ड्रिंक्स, खेलौनाबला, फोटो बलाकेँ पार करैत हम भीतर गेलहुँ । गाइड बसक यात्रीकेँ ठाढ़ करैत बुढ़ानिलकण्ठक विषयमे अपन वक्तव्य दऽ रहल छल । प्राचीकेँ नजरि ओकरा दिस नहि छल । ओ पुछए लागल, ‘अंकल बुझल अछि बुढ़ानिलकण्ठ भगवानक नाक कोना कटि गेल ?’ ‘नहि बुझल अछि बेटी ।’ ‘अहाँकेँ किछु नहि बुझल अछि । कोना टीचरशिप करैत छी ? एतबो नहि बुझल अछि बुढ़ानिलकण्ठ भगवान जे किसानकेँ भेटल छल ओकरे कोदारिसँ भगवानक नाक कटि गेल ।’ हम हँसए लगलहुँ । एकटा असहाय हँस्सी । एकटा अबहेलनाक हँस्सी । प्राची काठमाण्डूमे इङ्गिलिस मिडियममे पढि़ कऽ खूब स्मार्ट भऽ गेल अछि । गुञ्जा एतेक स्मार्ट नहि अछि गामक स्कूलमे पढ़ैत छल, नेपाली मिडियममे । आब साइकिल लऽ कऽ गामक नजदिकक स्कूलमे पढ़ए जाइत अछि । मुदा प्राचीक चेहरापर जे अभिजात्य झलकि रहल छल से गुञ्जाक चेहरा पर कहिओ नहि । हमर विवाह बहुत सामान्य तरिकासँ भेल छल । सिद्धान्त कऽ । हमर विवाहसँ पूर्व लड़की देखल गेल छल मुदा सीधा नहि । ओ मन्दिर पर बैसल छल हमर काकी आ माँ ओहि बगल बाटे बढि़ गेल छल, हमर विवाहक विषयमे कोनो सलाह नहि लेल गेल । विधिपूर्वक हमर विवाह भऽ गेल । बीए करैत समय रेणु नामक लड़कीसँ हमर घनिष्ठता बढ़ल । हमसभ सँगे एकबेर सिनेमा देखए गेल छलहुँ । कहिओकाल बातचित होइत छल, मात्र इहे हमर रोमान्स छल । दुनू गोटेमेसँ किओ मुहँ खोलि कऽ बात नहि कएलहुँ । बीए पढ़लाक बाद दुनू गोटेके दोसरकेँ चिठ्ठी देबएकेँ अवसर नहि भेटल । मुदा सोहाग रातिमे कनियाँक मुहँ देखलाक बाद मोनमे एकटा अभिलासा भेल छल, रेणुक सँग हमर विवाह होइत तऽ बढि़या होइत । मुदा रेणुकेँ नहि प्राप्त करएके पीड़ा हम धीरे—धीरे बिसरि गेलहुँ । पहिल प्रेमकेँ मात्र रोमान्टिक उपन्यासक नायक मात्रे नहि बिसरैत अछि । हम तऽ बहुत किछु बिसरि गेलहुँ । कहिओ रेणुकेँ नहि प्राप्त करएके पीड़ा हमरा नहि तड़पौलक । जखन की परमेशक विवाह अलग ढंगसँ भेल । ओकरा अधिकृत भेलाक बाद लड़कीक बाबूसभक घर पर जमघट लागल रहैत छल । हमरा विश्वास नहि होइत छल बड़का—बड़का स्टेटसबला लोक हमरा घरक बरण्डामे जुता खोलि कऽ पयर धोति छलाह आ घरक भीतर जा चुरा दही आ अमोट खा तृप्त होबएकेँ स्वाङ्ग करैत छलथि । बाबूजी प्रफुलित भऽ प्रत्येक प्रस्तावक बाद भेटएबला दहेजक सामानक लिष्ट बनाबए लगैत छलाह । माँ सुन्दर पढ़ल लिखल पुतहुँकेँ पायर दबाबएकेँ कल्पनामे प्रशन्न छल । हम ओहि समय ओहि कल्पनासँ उम्मिद नहि करएबला सम्झा रहल छलहुँ । परमेशक प्रेमक सम्बन्धक विषयमे हमरा जानकारी छल आ जहिना हम रेणुक बात ककरो कहि नहि पेलहुँ ओहन गल्ती परमेश नहि करथि से इच्छा छल । माँ आ बाबूजीक सभ गुणा भागकेँ झूठ सावित कऽ परमेश जिनकासँग विवाह करब ई सुनि कऽ हम आश्चर्यचकित भऽ गेलहुँ । कारण ओ अपन क्याम्पसक जामानक प्रेमीकाक सँग नहि रखने छल । अपने विभागक एकटा सिनियर अफिसरक बेटीकसँग विवाह करवाक प्रस्ताब रखने छल । ओकर निर्णयकेँ सभ स्वीकार कऽ लेलक । वीरगञ्जक सभसँ नीक होटलमे विवाह भेल । सभ व्यवस्था परमेशक ससुरे कएने रहथि । हमसभ मात्र दर्शक छलहुँ । बढि़या कपड़ा पहिर गामसँ जा कऽ वीरगञ्जक एकटा होटलमे रुकलहुँ । विवाहक दिन होटलक आगा हँसमूख बनि कऽ ठाढ़ अपरिचित अभ्यागतकेँ नमस्कार करैत—करैत हिनमान्यता साफ झलकि रहल छल । विवाहक एक दिनक बाद हमसभ गाम चलि अएलहुँ । भोज खेबाक गामक लोकक आशा अधुरा रहि गेल छल । ओसभ बादमे कनफुसकी कऽ रहल छलथि से भरोषाकसँग नहि कहि सकैत छी । परमेश ओहि समय हमरा जिलाक सभसँ उज्जवल रत्नक रुपमे चिन्हल जाइत छलाह । परमेश विवाहक बाद दू तीनबेर गाम अएलाह । पहिलबेर अपन कनियाँकसँंग बादमे असगरे—असगरे । पहिलबेर हुनकर कनियाँकेँ लऽ कऽ हमसभ चिन्तित छलहुँ । पुतहुँ औतीह, बढि़या भोजन बना कऽ खुऔतीह, पायर दबौती ई सभ आशा माँ पहिनेसँ छोडि़ देने छल । नव पुतहुँकेँ कोनो तरहे दिक्कत नहि हुए एहिकेँ लेल तैयारी होबए लागल । ई देखि कऽ हमर कनियाँ ईष्र्यामे जड़ए लागल छलीह । परमेश कारमे आएल । शायद एक राति गाममे रुकल फेर भोर होइते बीरगञ्ज चलि गेल । परमेशक कनियाँकेँ पोखरिदिस जाएमे असुविधा नहि हुए एहिकेँ लेल बाथरुम तैयार कएल गेल छल । बाँसक फट्टीसँ ओ बाथरुम बनाओल गेल छल । मुदा परमेशक कनियाँ ओकर उपयोग नहि कऽ सकलीह । भोरक नित्यकर्म कएने बीना चलि गेलीह । परमेश कहने छल, ‘एक दू घण्टामे जनकपुर पहुँच जाएब ओतहि होटलमे रुम बुक भेल अछि । नित्यकर्म ओतहि कऽ लेब ।’ बसन्तपुर दरवार, नारायणहिटी दरवार, रत्नपार्क देखलाक बाद हमसभ बसमे बैसि रहलहुँ । बसक गाइड कहलक, ‘आब काठमाण्डूक अन्य पुरातात्विक स्थलसभ पर घुमाएब ।’ प्राची पुछए लागल, ‘कुर्सीक लेल एक गोटे दोसरकेँ हत्या किए करैत अछि अंकल ? इतिहासक किताबमे मात्र सत्ताक लऽ कऽ संघर्ष एक गोटे दोसरकेँ मारि कऽ ओकर स्थान पर बैसैत अछि ।’ ‘एहिद्वारे बेटी, हमरा इतिहास बढि़या नहि लगैत अछि । मनुष्यक अवहेलना, गणितक संख्या, अंकक ईसभ चीज अपन भीतर देखलासँ लगैत अछि जे एकरो एकटा संसार अछि । मनुष्य जेकाँ ओकरो बहुत दुःख, बहुत शोक, प्राप्तीक चक्कर रहैत अछि मुदा ओकर जीवनमे एकटा नियम अछि, एकटा श्रृंखला अछि । ओ अपन स्वार्थक लेल कोनो नियम नहि तोड़ैत अछि ।’ ‘सहीमे अंकल ? मैथेमैटिक्स एतेक इन्टरेष्टिङ्ग अछि ?’ ‘तो प्राइम नम्बर पढ़ैत छएँ ? इन्टिजर ? अल्जेवरामे इन्टिजर ?’ ‘प्राइम नम्बर पढ़ने छी, मुदा एखनधरि अल्जेबरा नहि ।’

‘देखि, प्राइम नम्वर सभसँ असगरे संख्या अछि । कह एकके यदि हम भगवान वा बाबू जी कहिकऽ बजैबए तखन ओकरा छोडि़कऽ आओर कोनो गुणाक वा फेक्टर नहि । तोँ बड़का भऽकऽ पढ़बे, इन्टिजर विषयमे । ओतह देखबे, जन्मसँ बहुतरास संख्या निस्वार्थ होइत अछि । मात्र निस्वार्थ नहि, ओकरालग यथेष्ट कोनो वजुद नहि । ई सभ सोचलाक बाद हमरा कतेक अहसाय लगैत अछि ।’

‘रियली अंकल, मैथमे एतेक चार्म अछि ?’ परमेश गणितमे बढि़या नहि छल । इतिहासमे बढि़या नम्वर लबैत छल । कोन साल, कोन गतेकऽ ककर जन्म भेल, ककर निधन भेल, कहिआ कोन युद्ध भेल कम्प्यूटर जेँका बता दैत छल । हमरा ठीक उल्टा छल । परमेश हरेक चीजमे हमरासँ उल्टा छल । बाबूजीक निधनक बाद एकबेर गाम आएल छल असगरे, ओकर कनियाँ नहि आएल छल । श्राद्धक समय नौकेश सेहो करौने छल मुदा १३ दिनक बाद नहि रुकल । विधवा बूढ़ माँके बीना भेटने चलि गेल । मुदा हरेक महिना मायकँे लेल पाँच सय रुपैया पठाबए नहि बिसरैत छल । ओहि समयमे पाँच सय रुपैया बहुत होइत छल । माँ पैसा पाबि कृत्य—कृत्य भऽ जाएत छल । जेना पुत्रक जन्म दऽ ओकर जीवन सार्थक भऽ गेल अछि । हरेक महिना पोष्टमैन अबैत छल । माँके अँगूठा छाप लैत छल आ पाँच सय रुपैयासँग एकटा सादा मनिआर्डर कुपन दऽकऽ चलि जाइत छल । एकदम खाली मनिआर्डर कुपन । परमेश मायके नामसँ दू लाइनक चिठ्ठी सेहो नहि लिखैत छल । मुदा माँ ओ कुपन देखिकऽ सन्तुष्ट भऽ जाइत छल, जे ओहि खाली कुपनसँ माँके परमेशक सुखदुःख पता चलैत हुए । हम पूरे तमसा जाइत छलहुँ । माँके अपना लग राखि ओकर पूरे खर्च, रोग, पूरे आपति अभियोग, सुखदुःख सभ हम सहन करैत छलहुँ । जखन कि परमेश नहि कोनो बोझ उठेने, माँके पाँच सय रुपैया पठा हृदयमे एकटा बढि़या स्थान बना लेने छल । हम ओना नहि कऽ सकलहुँ । पैसे सभ किछु होइत अछि की ? हमरा मोनमे भऽ रहल छल, हम गणितमे बढि़या नम्वर आनि सीधा मनुष्यके गणित नहि सिखा पएलहुँ । जखन कि परमेश इतिहासमे बढि़या नम्वर आनि मनुष्यके हिसाब किताबमे ठीक उतरैत छल । माँके निधनक बाद बरखी श्राद्ध करए सेहो परमेश नहि आएल । ओ नहि बरखी कएने छल आ नहि नौकेस, इहो पता नहि मात्र एकटा चिठ्ठी पठौने छल माँके बरखीमे नहि आएब । विदेश जएबाक अछि । श्राद्धेके बाद पाँच सय रुपैया नहि पठौलक । पठाबहोके लेल कोन आवश्यकता छल । मुदा परमेश हरेक समय गामक लोकक बीच चर्चाक विषय बनल रहैत छल । पत्रिकामे बराबर ओकर नाम निकलैत रहैत छल । ओ एकटा निष्ठावान आदर्शवादी हाकिमक रुपमे अपन इमेज बना लेने छल । विभिन्न जिल्लामे अवस्थापित भेलाक समय प्रायः ओकरा छोटका नेता मन्त्रीधरिसँ झगड़ा होइत छल आ बेर—बेर ओकरा बदली होइत छल । ओ घूस नहि लैत छल । लोकक लेल ओ हरेक समय काज करैत छल आ राजनीतिक नेतासभक आगा भीरब ई बात नेपालक शिक्षित आ जागरुक नागरिक बुझैत छल । परमेशक ई इमेजबला बात गामक लोक सभ सेहो सुनने छल । स्कूलक शिक्षकसभ सेहो बच्चासभकेँ बढि़या पढ़ाई कऽ बढि़या नोकरी देबएकेँ उपदेश दैत छलथि । अन्तमे हमर गामक माइटक लेल परमेश हमर गर्वक विषय छल । एहि गर्वक कारण परमेशकेँ ओकर माँकेँ बरखी पर नहि अएलापर ककरो खराब नहि लागल छल । जेना की बात स्वभाविक छल । सभ मानि लेने छल परमेश जेहन निष्ठावान देश सेवक अफिसर की माँकेँ निधनपर आबि कऽ अपन समय बर्बाद करत ? बस ललितपुर दिस बढि़ रहल छल । गाइड ललितपुरक विषयमे कहए लागल । ओतए हमर सभक बस एक घण्टा रुकल । जलपान वा किछु भोजन कएलाक बाद ओतएसँ ललितपुरक ऐतिहासिक स्थलसभ घुमलाक बाद आजुक भ्रमण समाप्त भऽ जाएत । एकटा मन्दिर दिस तकैत प्राची कहलक, ‘एतए हम बहुत बेर आएल छी । एतए अंकल एकटा लोहाक खम्बा छैक, पीठ कऽ यदि दुनू हाथसँ ओहि खम्बाकेँ लेपटा लेनहुँ तऽ अहाँ सभसँ बेसी भाग्यमानी लोक हएब । हम आ मम्मी बहुत प्रयास कएने छलहुँ मुदा नहि कऽ सकलहुँ । डैर्डी मुदा कम्फर्टेबली खम्बाकेँ पीठ दिससँ पकडि़ लेलथि ।’ ‘तोहर डैडी भाग्यमानी छौक, तोरा नहि बुझल छौक ?’ ‘सभ भाग्यमानी किए नहि होइत अछि ? डैडी तऽ भगवान पर विश्वास नहि करैत छथि । मम्मीकेँ एहिद्वारे डैडीसँ कतेको बेर झगड़ो होइत अछि । डैडी कहैत छथि एहि संसारकेँ किओ नहि बनौने अछि । मनुष्यक जन्म कोना होइत अछि, मृत्यु कोना होइत अछि विज्ञान सभ बात जनैत अछि । मम्मी विश्वास नहि करैत अछि.....अंकल डैडी यदि भगवानमे विश्वास नहि करैत छथि तऽ भगवान हुनका भाग्यमानी कोना बना देलाह ?’ प्राचीकेँ ई सभ प्रश्नक उत्तर की हमरा लग छल ? परमेश पहिनेसँ प्रेक्टिकल लोक अछि हमर कनियाँ कहैत छथि परमेशक लग इमोशन, सेन्टिमेन्ट जेहन चीज नहि अछि । ओ बहुत हिसाब किताब बला लोक अछि । गणितकेँ बढि़या जेकाँ बुझैत अछि । गणितक अध्यापक ! हम कोना मानि लिअ गणितमे इमोशन सेन्टिमेन्टक स्थान नहि अछि । हम तऽ खोजने छलहुँ प्राइम नम्बरक निःसंगता, खोजी कएने छलहुँ नेगेटिभ नम्बरक शुन्यता । देखने छलहुँ शुन्यताक सेहो गणितमे स्थान अछि । शुन्यसँ सेहो बेसी आ चीज अछि गणितक लग । ऋणात्मक संख्यासँ सेहो बहुत किछु प्राप्ती होइत अछि गणितमे । ओहि दिन परमेशक चिठ्ठी आएल जे माय बापकेँ मरलाक बाद ओ गाम नहि आओत । एहिद्वारे ओकर हिस्सा, ओकर भागक जमीन कहँुना कऽ गामक धनीक सुटाई साहसँ बेचि देब । सुटाई साह लगसँ पैसा लाबएकेँ व्यवस्था ओ स्वयं कऽ लेत । गामक जमीनमे परमेश एकदिन हिस्सा माँगत हमर कल्पनासँ बाहर छल । परमेश लग तऽ सभ किछु अछि । बड़का नोकरी, रुपैया, घर, कार । एहि सभक अतिरिक्त ओ जमीन आ बाड़ीमे हिस्सा लेत । हमर कनियाँ पत्र पढि़ कऽ तमसा गेल छलीह । हमरा खौझबैत कहए लगलीह, ‘जीवनक गणित करैत—करैत बीता देलहुँ । परमेश मात्र एक्केटा गणित सिखलन्हि लाभ हानीक ! मात्र ।’ ‘हँ, मानैत छी परमेश बहुत प्रेक्टिकल अछि मुदा हमर कनियाँक बात सेहो अतिशयोक्ति नहि छल ? मानैत छी परमेशसँ हम ईष्र्या करैत छी, परमेश हमरा लेल कोनो काजक नहि अछि, तैयो ओ हमर भाई अछि । हम एकटा बरेरीक नीचा खेल कऽ बड़का भेल छी । बच्चामे एकसँग खेलने छी । एक साथ लड़ने छी । जखन एक गोटे माडि़ खाति छलहुँ तऽ दोसर ओकरा प्रति सहानुभूति जनबैत छलहुँ । आइ बड़का भऽ गेल छी तऽ एक गोटे दोसरकेँ चिन्ता नहि करी ? एतेक दूर रहलाक बादो सेहो ओ ई बुझि नहि पाएल जे गामक ई जमीन हमर संसार चलाबए लेल कतेक आवश्यक अछि ? ओ अवश्य राजी भऽ जाएत, अपन भाग छोड़ए लेल । हमरा काठमाण्डू आबएकेँ उद्देश्य सेहो इएह छल । बहुत दिनक बाद एहि उमेरमे काठमाण्डू अएलहुँ, परमेशसँ कहब, जमीनकेँ एहि तरहे हिस्सा नहि कर । ओकरा बुझाएब हम सरकारी स्कूलमे भलेहि काज करैत छी मुदा एखन धरि अस्थायी छी । गुञ्जाकेँ विवाहक बात सेहो अछि । परमेश हमरा देखि कऽ नहि प्रशन्न भेल आ नहि दुःखी । बल्की हम कतेक दिन रहब कोन–कोन स्थान घुमए जाएब कतएसँ की किनब कोन बससँ फिर्ता जाएब, ई बातसभ पुछए लागल । काठमाण्डूमे परमेशकेँ अफिस गाड़ी नहि देने छल । अफिसकेँ समयमे गाड़ी लेबए अबैत छल ओ जाए कालमे छोडि़ दैत छल । परमेशकेँ अपन एकटा कार छल मुदा बहुत सजा कऽ रखैत छल । परमेश पूरे व्यवस्था कऽ लेने छल । भक्तपुर हम आ प्राची जाएब । आइ काठमाण्डू आ ललितपुर । पर्यटक बसक लेल स्वयं ट्राभल्स एजेन्टक लग जा टिकट कटा देने छल । प्राची प्रश्न कएलक, ‘मनुष्यकेँ इतिहास आ गणितक इतिहासमे किछु अन्तर भेटैत अछि अंकल ?’ ‘ओह ! फेरसँ इतिहास । प्राची, हमर बेटी । हम गणितक शिक्षक छी, इतिहासक नहि, हमर विश्वविद्यालयमे गणित आ इतिहास दुनू कम्बिनेशन लेब स्वीकार नहि छल । केँ एहन नियम बनौलक, की पत्ता । ओ वास्तवमे बहुत बड़का दुरदर्शी रहल हेता ।’ आइ गाम जाएकेँ दिन । परमेशक कनियाँ हमरा लेल पूरी आ तरकारी बनौलीह । सँगमे पानिक बोतल आ टिफिन वक्स लेने नहि छलहुँ । ओ दुनू दोकानसँ किन अनलीह । बालाजुमे टिकट नहि भेटल । गौशालामे ककरो पठा परमेश टिकट अनलक । परमेश कहए लागल, ‘गौशालासँ बस रिंग रोड मार्फत घुमा कऽ लऽ जाइत अछि समय बेसी लागत हम अपन कारसँ सीधे कलंकी छोडि़ आएब ।’ प्राची ई दू दिनमे नजदिक भऽ गेल छल । घर जाएकाल बहुत जिद्द करए लागल, ओहो गाम जाएत ? गाम ? कोन गाम ? ओ गाम जतए तोहर माय एक बेर गेल छलहुँ ? ओ गाम जकर जमीन तोहर डैडी बेचए चाहैत छौक ? मुदा हम किछु नहि कहि पेलहुँ । अएला दू तीन दिन भीतर हम अपना आबएकेँ उदेश्य परमेशकेँ नहि कहि पेलहुँ । एकबेर सेहो ओ नहि पुछलक, हम किए आएल छी । सोचि रहल छलहुँ, ओ अपन चिठ्ठीक विषयमे पुछत । जमीनक हिस्सा करएबला बात । ओहि समय हम अपन बात राखब । मुदा ई बात सेहो परमेश नहि उठौलक हमरा कहब आवश्यक छल यदि एखनो ई बात नहि कहि पेलहुँ तऽ एतेक पैसा खर्च कऽ एतेकदूरी तय कऽ कऽ आएल छी, सभ व्यर्थ भऽ जाएत । गामक जमीनकेँ हमरा बहुत आवश्यकता अछि । गुञ्जाकेँ विवाह नहि भेल अछि । स्थायी नहि भेलाक कारण सेवा निवृतिकेँ पैसा नहि भेटत हमर, सभ हिसाब किताब फेल भऽ गेल अछि । आखिर एहिसमय हमरा लगसँ जमीन परमेश नहि लेत । ओकरा लग कोन चीजक कमी अछि आ बहुत जमीन किनिओ लेने अछि । गाड़ी चलबैत—चलबैत परमेश कहए लागल, ‘हम एकटा चिठ्ठी पठौने छलहुँ भेटल ?’ आब कहब उचित हएत । एहिबेर बीना लाज कएने अभाव आ समस्याकेँ आगा रखैत कहब आवश्यक अछि, एहिबेर नहि कहलासँ बहुत किछु हमर समाप्त भऽ जाएत । हमर सुरक्षा, गुञ्जाक विवाह आ हमर आर्थिक अवस्था । परमेश कहए लागल, ‘हमरा पैसाकेँ बहुत आवश्यकता अछि । सोचि रहल छी जनकपुरमे एकटा घर किनी । इम्हर—उम्हर जोगाड़ कऽ रहल छी नहि भऽ पावि रहल अछि । यदि गामक हमर भागक जमीन ....।’ हमर आगा अस्पष्ट धुनि देखाई देबए लागल, ओ धुनिक भीतर परमेश कतहँु हरा गेल छल । अन्हार आ प्रकाशक छाँया बीच पर्दा पर देखाई देबए लागल हमर अतितक कैनवास । हमरा आगा १५ बर्षक परमेश ठाढ़ अछि । संकोच, सभ्रम, भय आ आशंकासँ भड़ल । कहि रहल अछि कलेजक सभ लड़का मनकामना जाइत अछि, हमरा लग पैसा नहि अछि । यदि पाँच सय रुपैया दैतहुँ ....। स्कूलमे तलब नहि भेटि रहल छल । गुञ्जाकेँ टाइफाइड दबाइक दोकान पर उधारी छल । दू बर्ष भऽ गेल छल घर पर खपड़ा बदलला । छतमे सूर्य चन्द्रमा देखाए लागल छल । हमर पायरक चप्पल टुटि गेल छल । स्कूल जाएमे लाज लागि रहल छल । तैयो परमेशकेँ देखि कऽ मोनमे प्रेम जागल । बेचारा जाए चाहैत अछि तऽ घूमि आबौक । परमेश गाड़ी रोकलक । कलंकी आबि गेल छल । कहए लागल, ‘भैया, उत्तर नहि देलहुँ ?’ हम स्वीकारोक्तिमे मुहँ हिलबैत बस दिस बढि़ गेलहँु ।