रघुनन्दन दास
नाम: साहित्य रत्नाकर मनस्वी रघुनन्दन दास
मनस्वी रघुनन्दन दास से मुंशी रघुनन्दन दास तक:- नाम में उच्चारण का परिवर्तन के कारण साहित्य रत्नाकर मनस्वी रघुनन्दन दास मुन्शी रघुनन्दन दास हुए वो एक प्रसिद्ध साहित्यकार थे। उनके नाम में जो ‘मनस्वी’ शब्द था, वह मन के स्वामी और विद्वान का प्रतीक था। लेकिन समय के साथ और बोलचाल की भाषा में सरलता के कारण उनका नाम धीरे-धीरे मुंशी रघुनन्दन दास के रूप में प्रचलित हो गया। मुंशी शब्द मूल रूप से फारसी भाषा से आया है, जिसका अर्थ होता है “लेखक,” “सचिव,” या “शिक्षित व्यक्ति।” यह उपाधि उन व्यक्तियों को दी जाती थी जो खासकर प्रशासन, शिक्षा, या साहित्य के क्षेत्र में विद्वान और प्रवीण होते थे। उच्चारण में आसानी और समाज में इस शब्द की प्रतिष्ठा के कारण लोगों ने ‘मनस्वी’ की जगह ‘मुंशी’ कहना शुरू किया।
साहित्य रत्नाकर (मनस्वी) मुंशी रघुनन्दन दास संस्कृति,साधना और साहित्य के तेजस्वी दीपस्तंभ।
जन्म: सन् 1860 मृत्यु: सन् 1945
ग्राम: सखवाड़, प्रखण्ड मनीगाछी, जिला दरभंगा, बिहार।
जीवन संग्राम का उगता सूरज सखवाड़ की वसुंधरा पर जब 1860 ईस्वी में एक बालक ने प्रथम बार साँस ली, तब शायद स्वयं सरस्वती ने उस क्षण को अपने आँचल में बाँध लिया था। वह बालक कोई साधारण देहधारी नहीं, बल्कि मिथिला की कोख से जन्मा वह तेजस्वी रत्न था, जो आगे चलकर "साहित्य रत्नाकर" के रूप में लोकश्रुति बना। पिता और चाचा के असामयिक निधन ने बाल्यकाल में ही कंधों पर जीवन का भार रख दिया, किन्तु वह भार बोझ नहीं बना, बल्कि तप का साधन बना। संघर्षों से सँवरे उस जीवन की नींव में परंपरा की गंध, संस्कृति की संजीवनी और विद्या की दीपशिखा जलती रही। उन्होंने न केवल अपने परिवार को संभाला, अपितु उसे ज्ञान, धर्म और मर्यादा के मूल्यों से संजोया। यही वह भूमि थी, जहाँ से उन्होंने साहित्य, तंत्र और समाज सेवा की दीर्घ यात्रा आरंभ की।
पूर्वज :-आमत्य पद धारी "अमृतकर" एक महान योद्धा, चतुर रणनीतिकार , प्रकांड न्यायविद, कुशल प्रशासक थे। कौटिल्य ने राज्य के सात अंगों (सप्तांग) में से एक प्रमुख अंग बताया है – आमत्य पद को।
एक बात का यहाँ उल्लेख करते हए बड़ा गौरव अनुभव होता है कि जिस. साहित्य- कल्पतरू श्रंगार-रस के रसिक प्रतापी महाराज शिवसिंह के आश्रित कवि-कोकिल विद्यापति थे उसी महाराज के प्रधान अमात्य मुन्शी जी के ही पू्वज, बलाइनवंश-विभूषण स्वनामधन्य अमृतकर (अमिकर)ठक्कुर थें। जब मुसलमान आक्रांता इब्राहिम शाह की सेना गयास बेग के नेतृत्व में 1406 ईस्वी में शिवसिंह जी के राज्य पर आक्रमण किया तो युद्ध के दौरान विद्यापति जी ने क्रुर मुसलामान आक्रांत इब्राहिम शाह के डर से शिवसिंह जी की रानी (लखिमा देवी) एवं कुटुंबों को लेकर राजबनौली, (नेपाल ) के राज पुरादित्य गिरिनारायण की शरण ली थीं। राज्य की उस संकटापन्न अवस्था में अमृतकर ठक्कुर ने पटना जाकर आक्रांत मुसलमानों से मिथिला-राज्य के लिये अभयदान प्राप्त किया था , इसका उल्लेख स्वर्गीय "पंडित चन्दा झा ने अपनी "पुरुष-परीक्षा' टीका के अंत में किया है।
युद्ध के दौरान शिवसिंह का कुछ पता नहीं चला लापता हो गए मृत्यु की भी पुष्टि नहीं हुई । रानी लखिमा देवी शिवसिंह का 12 वर्षों इंतजार के मध्य - 1416-17 से 1428-29 तक अत्यन्त दुःखद समय के बावजूद कविवर विद्यापति एवं शिव सिंह के आमात्य अमृतकर ठक्कुर (आमिकर) के सहयोग से शासन का संचालन किया। अमृतकर ठक्कुर कभी-कभी कविता भी कर लिया करते। यह कविवर 'लोचन' रचित 'राग-तरंगिणी" ग्रंथ से प्रमाणित है। कवि कंठ-हार विद्यापति और आमत्य-अमृतकर में अत्यंत 'घनिष्टता एवं आत्मीयता थी। यह भी विद्यापति विरचित मिथिला में प्रचलित निम्नांकित पद से सुस्पष्ट है।
नीतिनिपुणा गुणा नाह "अंक में अतिशय आगर। कोष-काव्य-व्याकरण अधिकारक सागर।।
सब कर सम्मान सबहुँ सौं नेह-वढ़ाविअ। विप्र-दीन अति दुखी सबहुँ काँ विपति छोड़ाबिअ।।
कायस्थ मॉंह सुरसिद्ध भउ चन्द्र तुला इव राशिंघर। कबिकंठहार कलउच्चरई अमिय बरस्सइ अमिकर।।
साहित्यिक अवदान:-महाकाव्यकार की अमर कृति मुंशी रघुनन्दन दास मैथिली साहित्य के प्रथम महाकाव्यकार माने जाते हैं। उनका कालजयी महाकाव्य "सुभद्राहरण" केवल पद्य का संग्रथन नहीं, बल्कि मिथिला भाषी की आत्मा का गायन है। इस महाकाव्य में जहाँ साहित्यिक लालित्य है, वहीं सांस्कृतिक गौरव एवं पुरुषार्थ की झलक भी है। उन्होंने "मिथिला नाटक" तथा "दूतांगद व्यायोग" जैसे अन्य विशिष्ट ग्रंथों की रचना की, जो आज भी विद्यापति परंपरा के उत्तराधिकारियों के लिए दीपस्तंभ हैं। उनके साहित्य में शब्द नहीं, संस्कार बोलते हैं। उनकी लेखनी में रस, अलंकार और दर्शन का जो त्रिवेणी-संगम है, वह उन्हें "साहित्य रत्नाकर" की उपाधि का पूर्ण अधिकारी बनाता है।
तंत्र साधना और राजदरबार, साधना और सत्ता का समन्वय:- मुंशी जी केवल कलम के धनी नहीं थे, वे तंत्र-विद्या के गंभीर साधक भी थे। उनका संबंध दरभंगा राज के महाराजा रामेश्वर सिंह से न केवल राजनैतिक था, अपितु आध्यात्मिक भी। उनके साथ मिलकर उन्होंने षोडशोपचार (तांत्रिक विधि) पर आधारित सरस्वती पूजन की परंपरा को जन्म दिया, जो आज भी 125 वर्षों से अधिक समय से बसंत पंचमी पर मुन्शी जी के परिवार में उनके वंशजों द्वारा विधिपूर्वक होती आ रही है। राजमहल में उनका स्थान केवल एक विद्वान का नहीं था,बल्कि एक दिशा-दर्शक का था। मिथिला की आत्मा में रची-बसी तांत्रिक संस्कृति को उन्होंने शास्त्रसम्मत स्वरूप दिया।
परिवार संस्कृति का वटवृक्ष:- मुंशी जी की तपस्या केवल वैयक्तिक नहीं रही, उनका परिवार भी संस्कृति, सेवा और शिक्षा एवं स्वतंत्रता संग्राम का पर्याय बन गया। इनके परिवार का घनिष्टता सुभाष चंद्र बोस, राजेन्द्र प्रसाद, रवीन्द्रनाथ टैगोर, के बी सहाय, बृजकिशोर प्रसाद, जय प्रकाश नारायण, श्री कृष्ण सिंह जैसे विभूतियों के साथ था।
हरिनंदन दास (छोटे भाई):- सरस्वती के आंचल के छाया से प्राप्त विद्वान, प्रसिद्ध अधिवक्ता और दरभंगा जिला बोर्ड के पहले भारतीय अध्यक्ष। इतना सम्मान कि जिला बोर्ड के चुनाव में राजपरिवार विरुद्ध खड़ा हुए दरभंगा राजपरिवार को पता चला तो उन्होंने अपना नाम चुनाव से वापस ले लिए।
वासुदेव दास (छोटे भाई):- सरस्वती के आंचल के छाया से प्राप्त विद्वान, उत्तर बिहार में व्यापार के क्षेत्र में ध्वजवाहक। स्मृति एसी की देवी मेधा स्वयं उनके मष्तिष्क में विराजमान रहती थीं।
सुकदेव दास (छोटे भाई):- सरस्वती के आंचल के छाया से प्राप्त विद्वान, कृषि क्षेत्र में नवाचार के अग्रदूत। कृषि कौशल एसा की देवी अन्नपूर्णा उनके हृदय में विराजमान रहतीं थी।
बाबू शैलेंद्र नाथ दास (भतीजा "पुत्र वासुदेव दास"):- सरस्वती के आंचल के छाया से प्राप्त विद्वान,शौर्य बल एसा की स्वयं देवी काली, शक्ति प्रदान करती हो वो राष्ट्र प्रथम की भावना के साथ राष्ट्रभक्ति के नभ में उड़ान भरता एक अमर पायलट बाबू शैलेन्द्र नाथ दास वो केवल एक पायलट नहीं थे—वे थे आकाश के निर्भीक सेनानी,जिनके लिए उड़ान सिर्फ एक कला नहीं,अपितु राष्ट्रसेवा का एक तपस्वी पथ था। जब अधिकांश युवा जीवन की दिशा तलाशते हैं,उन्होंने टाटा एयर सर्विस के माध्यम से अपने साहसिक स्वप्नों को पंख दिए। लेकिन उनकी नियति तो और भी ऊँची उड़ान भरने की थी। द्वितीय विश्व युद्ध की रणभेरी जब गूँजी, तो उन्होंने ब्रिटिश भारतीय वायुसेना की वर्दी पहनी—न केवल एक पायलट के रूप में, बल्कि एक योद्धा के रूप में। परंतु उनके हृदय में तो भारत माता के स्वतंत्र आकाश की चाह बसती थी। सुभाष चंद्र बोस के क्रांतिकारी विचारों से प्रेरित होकर वे वैचारिक तौर पर आज़ाद हिन्द फौज से जुड़े । स्वतंत्र भारत में जब नवभारत की वायुसेना आकार ले रही थी, तो वे पहले सात भारतीय वायुसेना अधिकारियों में सम्मिलित हुए—उन वीरों में एक थे सुब्रतो मुखर्जी, जो आगे चलकर भारतीय वायुसेना के प्रथम प्रमुख बने। जब-जब वे घर लौटते, तब उनके शब्दों में युद्ध के गर्जन की प्रतिध्वनि होती और युवाओं के मन में राष्ट्रप्रेम का ज्वार उठता। वे न केवल पायलट थे, वे युवाओं के लिए प्रेरणास्तंभ थे, एक जीवंत गाथा जो साहस, समर्पण और सेवा का प्रतीक बन चुकी थी। किन्तु हर ऊँची उड़ान को एक विराम भी होता है। निरंतर संघर्ष, थकान और कठोर प्रशिक्षण से उपजे स्वास्थ्य संकट ने उन्हें अपने शिकंजे में जकड़ लिया। अजमेर में जब वे अस्वस्थ हुए, तो उन्हें दरभंगा लाया गया, परन्तु नियति को कुछ और ही स्वीकार था। राष्ट्र का यह अमर पुत्र अत्यंत अल्पायु में ही कालगति को प्राप्त हो गया। पर क्या कोई वीर वास्तव में मरता है? उनकी शौर्यगाथा आज भी सखवाड़ ग्रामवासियों को प्रेरित करती है। वे थे, हैं और रहेंगे—राष्ट्र के नभ में अमर, अविचल और अजेय। उनकी अकाल मृत्यु भी एक वीरगाथा बन गई।
विद्या अलंकार नरेंद्र नाथ दास (पुत्र):-सरस्वती के आंचल के छाया से प्राप्त विद्वान, विद्या अलंकार नरेंद्र नाथ दास ज्ञान संस्कृति और स्वतंत्रता संग्राम के त्रिवेणी संगम । बिहार की सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना के इतिहास में विद्या अलंकार नरेंद्र नाथ दास एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने ज्ञान, साहित्य और स्वतंत्रता संग्राम – तीनों क्षेत्रों में अपनी अमिट छाप छोड़ी। वे न केवल एक निर्भीक स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि एक महान साहित्यकार और संस्कृति के संवाहक भी थे। नरेंद्र नाथ दास की विद्वत्ता का प्रमाण उनकी कालजयी कृति "विद्यापति काव्यलोक" है, जो मैथिली के महाकवि विद्यापति के काव्य-संसार को नये ढंग से प्रस्तुत करती है। इस ग्रंथ की प्रस्तावना स्वयं रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखी – जो इस रचना की साहित्यिक गरिमा और उसकी गूढ़ता को दर्शाता है। इससे स्पष्ट है कि नरेंद्र नाथ दास केवल स्थानीय स्तर पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी एक सम्मानित बौद्धिक व्यक्तित्व थे। उनका जीवन संघर्ष और सेवा का पर्याय था। सर्वप्रथम विद्यापति समारोह की परिकल्पना 1921 ईस्वी को उन्होंने किया और विद्यापति समारोह बांकीपूर-पटना के राममोहन राय मिशनरी में आरंभ किया जो तत्कालीन अँग्रेजी पत्रिका सर्चलाइट में प्रकाशित हुआ था। उसके बाद ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलन में भाग लेने के कारण पटना कैम्प जेल में बंदी थे, तब भी उन्होंने हार नहीं मानी और जेल में ही विद्यापति समारोह मनाए। वहीं से जो उन्होंने विद्यापति का अलख जगाई – जो आगे चलकर एक सांस्कृतिक आंदोलन का रूप ले चुका है। यह उनकी सांस्कृतिक प्रतिबद्धता और अथक साधना का प्रतीक है। राजनीति में भी वे जनता की सेवा के लिए आगे आए। स्वतंत्रता के बाद, वे मनीगाछी विpधान सभा क्षेत्र से 1952 ईस्वी में प्रथम विधायक बने। उनके कार्यकाल में शिक्षा, संस्कृति और समाजसेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य हुए। निष्कर्षतः, विद्या अलंकार नरेंद्र नाथ दास एक ऐसे व्यक्तित्व थे, जिन्होंने ज्ञान, साहित्य, संस्कृति और जनसेवा – चारों दिशाओं में अपनी छाप छोड़ी। वे आज भी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। उनके जीवनी से हमें यह सीखना चाहिए कि ज्ञान का प्रयोग केवल आत्मविकास नहीं, समाजोत्थान के लिए भी होना चाहिए। उनमें राष्ट्र सेवा और स्वतंत्रता संग्राम में शौर्य और बलिदान का संगम देखने को मिलता है।
मुंशी जी का घर स्वतंत्रता संग्राम का एक मौन प्रहरी था –जहाँ विचारों की मशाल जलती थी,जहाँ सेनानियों को शरण मिलती थी, जहाँ स्वतंत्रता का स्वप्न साकार होता था। जेपी आंदोलन की नींव रखने में इस परिवार का अविस्मरणीय योगदान रहा।
उनकी जीवन यात्रा एक ऐसा व्रत थी, जो राष्ट्र,समाज और संस्कृति की सेवा में अर्पित हो गई।
निष्कर्ष: एक युग का व्यक्तित्व
मुंशी रघुनन्दन दास मात्र एक नाम नहीं, बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक हैं। वे शब्दों के साधक थे,तंत्र के तपस्वी,समाज के दीपक और राष्ट्र की आत्मा। उनके जीवन का हर पहलू आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके काल में था। "वे केवल साहित्यकार नहीं थे, वे स्वयं एक युग थे। उनकी छाया में पला हुआ हर नाम एक प्रेरणा बन गया – संस्कृति, सेवा और संघर्ष का जीवंत प्रतीक।"1860-1945
सत्य प्रकाश भास्कर.
ग्राम :- सखवाड़, मनीगाछी, दरभंगा- 847424