कूर्म अवतार

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गुर्जर पिपरई सरकार. |भगवान कूर्मावतार]] हिन्दू धर्मक अनुसार कूर्म कच्छवातार भगवान विष्णुक दोसर रूप छी। कूर्मावतारमे भगवान विष्णु कछुवाक रूप धारण करै समुन्द्र मथन केने देवता आ दैत्यसभक उदार केने छल । ई अवस्थामे भगवान विष्णु तिनटा रूप धारण केने छल ।

कूर्म अवतार[सम्पादन करी]

मन्दराचल पर्वत समुन्द्रक गहिराईमे डुबै लागल । ई देख देव दानवसभ फेर बिष्णुक शरण लेलक। भगवान विष्णु सेहो कछुवाक रूप धारण करै पर्वतके अपन पिठमे अड्कलक। समुन्द्र मथनसँ सबसँ पहिल हलाहल नामक बिषक उत्पत्ती भेल छल हलाहल बिषक असर देवतासभ सहन नै सकल । भगवान शिव ई हलाहल बिष सब पिलक। शिव हलाहल खाएल पछा उनकर घाँटी निला परै लगल । शिवके निलकण्ठ कहैत अछि। समुद्र मथनसँ धनक देवी लक्ष्मी, काम धेनु, रम्भा नामक अप्सरा, उच्चश्रवा घोडा, भगवान विष्णुक गलामे पहिरिएल कोस्तुभमणी, पारीजात कल्प वृक्ष, आदी १३ रत्न पछा अमृतक उत्पत्ती भेल छल ।

धन्वन्तरी अवतार[सम्पादन करी]

समुद्र मथनमे अमृतक घडा हातमे लऽ भगवान विष्णु धन्वन्तरीक रूप धारण करै आएल । शान्त स्वभावक अमृत कलस हातमे लेने धन्वन्तरीके पछा देवतासभ वैद्य बनाएलक । हिन्दू धर्म शास्त्रक अनुशार भगवान धन्वन्तरी आयुर्वेदक ज्ञाता मानै अछि। अमृत देख दानवसभ पहिल धन्वन्तरीक हातसँ लेलक। फेर एक आपसमे अमृत कलश खोसा खोस करै लगल । देवतासभ देखैत रहल । देवतासभक कुछ चलन देवतासभ समुद्र मथर थाक गेल छल । नै ओ दानवसग अमृत माग्न सकल नै त छिन सकल । धन्वन्तरी अमृतक कलश दऽ अन्तर्ध्यान भेल ।

सन्दर्भ सामग्रीसभ[सम्पादन करी]

बाह्य जडीसभ[सम्पादन करी]

एहो सभ देखी[सम्पादन करी]