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झलकारीबाई

मैथिली विकिपिडियासँ, एक मुक्त विश्वकोश
झाँसी सेनापती वीरांगना झलकारीबाई कोली
Commander Virangana Jhalkaribai Koli
झाँसी में वीरांगना झलकारीबाई की प्रतिमा
जन्म(१८३०-११-२२)२२ नवम्बर १८३०[]
भोजला गांव, झाँसी बुंदेलखंड
मृत्यु०४ अप्रैल १८५८ झाँसी[]
झाँसी किला, बुंदेलखंड
अन्य नामसभWomen's Army Commander

वीरांगना झलकारीबाई कोली (२२ नवम्बर १८३० - ४ अप्रैल १८५८)[] झाँसी की रानी रानी लक्ष्मीबाई नियमित सेना में, महिला शाखा दुर्गा दल की सेनापती थी। [] वह महारानी लक्ष्मीबाई की हमशक्ल भी थी।

झलकारी बाई का जन्म 22 नवम्बर 1830 को झांसी के पास के भोजला गाँव में एक निर्धन कोली परिवार में हुआ था। झलकारी बाई के पिता का नाम सदोवर सिंह और माता का नाम जमुना देवी था। जब झलकारी बाई बहुत छोटी थीं तब उनकी माँ की मृत्यु के हो गयी थी, और उसके पिता ने उन्हें एक लड़के की तरह पाला था। उन्हें घुड़सवारी और हथियारों का प्रयोग करने में प्रशिक्षित किया गया था। उन दिनों की सामाजिक परिस्थितियों के कारण उन्हें कोई औपचारिक शिक्षा तो प्राप्त नहीं हो पाई, लेकिन उन्होनें खुद को एक अच्छे योद्धा के रूप में विकसित किया था। झलकारी बचपन से ही बहुत साहसी और दृढ़ प्रतिज्ञ बालिका थी।

झलकारी घर के काम के अलावा पशुओं का रख-रखाव और जंगल से लकड़ी इकट्ठा करने का काम भी करती थीं। एक बार जंगल में उसकी मुठभेड़ एक तेंदुए से हो गयी थी और झलकारी ने अपनी कुल्हाड़ी से उस तेंदुआ को मार डाला था। एक अन्य अवसर पर जब डकैतों के एक गिरोह ने गाँव के एक व्यवसायी पर हमला किया तब झलकारी ने अपनी बहादुरी से उन्हें पीछे हटने को मजबूर कर दिया था। उसकी इस बहादुरी से खुश होकर गाँव वालों ने उसका विवाह रानी लक्ष्मीबाई की सेना के एक सैनिक पूरन कोरी से करवा दिया, पूरन भी बहुत बहादुर था और पूरी सेना उसकी बहादुरी का लोहा मानती थी।

महारानी लक्ष्मीबाई से मुलाकात

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एक बार गौरी पूजा के अवसर पर झलकारी गाँव की अन्य महिलाओं के साथ महारानी को सम्मान देने झाँसी के किले में गयीं, वहाँ रानी लक्ष्मीबाई उन्हें देख कर अवाक रह गयी क्योंकि झलकारी बिल्कुल रानी लक्ष्मीबाई की तरह दिखतीं थीं ( दोनो के रूप में आलौकिक समानता थी। ) अन्य औरतों से झलकारी की बहादुरी के किस्से सुनकर रानी लक्ष्मीबाई बहुत प्रभावित हुईं।

महिला सेना दुर्गा दल में सेनापती

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महारानी लक्ष्मीबाई ने झलकारी को महिला सेना दुर्गा सेना में शामिल करने का आदेश दिया। झलकारी ने यहाँ अन्य महिलाओं के साथ बंदूक चलाना, तोप चलाना और तलवारबाजी की प्रशिक्षण लिया। यह वह समय था जब झांसी की सेना को किसी भी ब्रिटिश आक्रमक का सामना करने के लिए मजबूत बनाया जा रहा था। और उसे महिला सेना का सेनापती बनाया। इस दुर्गा दल में झलकारी के साथ मोतीबाई, अवंतीबाई, ललिताबाई बक्शी, सुंदर, मुंदर, काशी, जूही आदी वीरांगनाऐं थी।

झाँसी का युद्ध 1858

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लार्ड डलहौजी की राज्य हड़पने की नीति के चलते, ब्रिटिशों ने निःसंतान महारानी लक्ष्मीबाई को उनका उत्तराधिकारी गोद लेने की अनुमति नहीं दी, क्योंकि वे ऐसा करके राज्य को अपने नियंत्रण में लाना चाहते थे। हालांकि, ब्रिटिश की इस कार्रवाई के विरोध में रानी लक्ष्मीबाई की सेना, उसके सेनानायक और झांसी के लोग रानी के साथ एक हो गये और उन्होने आत्मसमर्पण करने के बजाय अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाने का संकल्प लिया। अप्रैल 1858 के दौरान, महारानी लक्ष्मीबाई ने झांसी के किले के भीतर से, अपनी सेना का नेतृत्व किया और ब्रिटिश और उनके स्थानीय सहयोगियों द्वारा किये कई हमलों को नाकाम कर दिया। रानी के सेनानायकों में से एक राव दुल्हाजू ने उसे धोखा दिया और किले का एक संरक्षित द्वार ब्रिटिश सेना के लिए खोल दिया। जब किले का पतन निश्चित हो गया तो रानी के सेनापतियों और झलकारी बाई ने उन्हें कुछ सैनिकों के साथ किला छोड़कर भागने की सलाह दी। रानी अपने घोड़े पर बैठकर दामोदर राव के साथ 4 अप्रैल 1858 की देर रात में झांसी किले से कुदकर कालपी चलीं गयी!

झाँसी के लिये पती की शहादत

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4 अप्रैल 1858 की रात झलकारीबाई के पती तथा झांसी किले के सैनिक पूरन सिंह ने अंग्रेजों का जमकर मुकाबला किया। किंतू किले की रक्षा करते हुऐ तोप का गोला लगने से शहीद हो गये। लेकिन झलकारी ने बजाय अपने पती की मृत्यु का शोक मनाने के बजाय अंग्रेजों से लोहा लेना शुरू किया। झलकारीबाई ने अंग्रेजों को काटना आरंभ किया। झांसी के इतिहास का सबसे भयानक युद्ध और उसकी नायिका झलकारीबाई थी।

प्राण न्योछावर

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झलकारीबाई ने अंग्रेजों को धोखा देने की एक योजना बनाई। झलकारी ने लक्ष्मीबाई की तरह कपड़े पहने, दामोदर राव के प्रतिक को पीठ पर बांधा और झांसी की सेना की कमान अपने हाथ में ले ली। देर रात तक लडते लडते आखिर में झलकारीबाई को गोली लगी। और 4 अप्रैल 1858 को रात में वे झांसी किले में शहीद हुई!

कहां जाता हैं की...अंग्रेजों ने उन्हे रानी लक्ष्मीबाई समझकर आननफानन में जला दिया। तथा 5 अप्रैल 1858 को पुरा झांसी किला जला दिया गया!

  1. Sarala 1999, p. 111
  2. 1 2 "When Jhalkari Bai fought as Lakshmi Bai", Tribune India, मूलसँ ११ मई २००८ मे सङ्ग्रहित, अन्तिम पहुँच २६ मार्च २०१० |deadurl= प्यारामिटर ग्रहण नहि कएल (सहायता), which quotes Mr. Nareshchandra Koli stating her date of death as 4 April 1858. Sarala (1999), pp. 113–114 notes that she died in the battle following her disguise incident suggesting the date 4 April 1858. Varma & Sahaya (2001), p. 305 notes that she died as a very old woman without giving any exact date of death.
  3. "वीरांगना - झलकारी बाई" (पीएचपी), मधुमती, मूलसँ २०११-०७-१३ मे सङ्ग्रहित, अन्तिम पहुँच २०१७-०३-०८ |dead-url= प्यारामिटर ग्रहण नहि कएल (सहायता); |accessyear= प्यारामिटर ग्रहण नहि कएल (सहायता); |accessmonthday= प्यारामिटर ग्रहण नहि कएल (सहायता)