धूर्त्त समागम
| धूर्त्त समागम | |
|---|---|
| लेखक | ज्योतिरीश्वर ठाकुर |
| पात्रसभ | सूत्रधार, विश्वनगर, मृत्ताङ्गार ठाकुर, असज्जाति मिश्र, स्नातक, मूलनाशक, विदुषक, नटी, सूरतप्रिया आ अनङ्गसेना[१] |
| प्रदर्शित तिथि | सन् १३२४[१] |
| प्रदर्शित स्थान | मिथिला तत्कालिन सिमरौनगढ, नेपाल |
| मूल भाषा | संस्कृत, प्राकृत तथा मैथिली |
| विषय | व्यङ्ग्य नाट्यग्रन्थ |
| विधा | प्रहसन[२] |
धूर्त्तसमागम प्रहसन विधाक मैथिली साहित्य केर पहिल नाट्यकृति छी।[३] ई व्यङ्ग्य नाट्यग्रन्थ मैथिली कविश्वर ज्योतिरीश्वर ठाकुरद्वारा मूल रूपमे लिखल गेल अछि।[४] सन् १३२४ मे तत्कालिन तिरहुत राज्य केर राजधानी सिम्राैनगढ़मे ई कृति लिखल गेल छल। ई नाटक धूर्त्तसमागम केर प्रारम्भिक मञ्चन काठमाडौँ उपत्यकामे भेल छल। एहि नाटकमे पहिल बेर मैथिली गीत केर प्रयोग भेल छल आ ई नाटकमे कुल २० टा मैथिली गीत प्रयुक्त अछि।[१]
सन् १८५७ मे डा. जयकान्त मिश्र नेपाल भ्रमण केर समयमे अध्ययन अनुसन्धान करि एकर प्रकाशन केनए छल।
पात्रसभ
[सम्पादन करी]- सूत्रधार[१]
- विश्वनगर
- मृत्ताङ्गार ठाकुर
- असज्जाति मिश्र
- स्नातक
- मूलनाशक
- विदुषक
- नटी
- सूरतप्रिया
- अनङ्गसेना
पटकथा
[सम्पादन करी]अनङ्गसेना नामक एक वेश्याक लेल विश्वनगर नामक सन्यासी आ स्नातक नामक ओकर शिष्यबीच भेल वाद विवाद धूर्त्तसमागम नाट्यकृति कऽ मूल विषय बनाएल गेल अछि। गुरु–शिष्यमे सँ के अनङ्गसेना केर अप्पन बनाएत तकर निष्कर्ष नई लागलाक बाद ओ दुनू पञ्चायत करवाक लेल असज्जाति मिश्र नामक ब्राह्मण कतय अनङ्गसेना केर सेहो लऽ कऽ जाएत अछि। मुदा ओतय असज्जाति स्वयं अनङ्गसेना प्रति आकर्षित भऽ जाएत अछि आ ओ हुनका पर पहिल हक अप्पन लागवाक दाबी कऽ दैत अछि। एवम् प्रकारे बूढ़ ब्राह्मणद्वारा खेल उल्टेवाक भान पावि हुनकर शिष्य बन्धुवञ्चक एहन बुढ़ बृद्धसङ्ग की जाएब कहि अनङ्गसेना केर पोल्हाबऽ लगैत अछि। एहि अवस्थामे मूलनाशक नामक नौआ ओतय आबि जाएत अछि आ अप्पन हजामत कएल कमैनी केर बदलामे अनङ्गसेना उपर अप्पन दावेदारी पेस कऽ दैत अछि। एवम् प्रकार सँ एहि नाटकमे धूर्ते–धूर्त कऽ गजब जमघट कराएल गेल अछि आ एहि आधारमे ई नाटक कऽ शीर्षक धूर्त्तसमागम केर सार्थक बनेनाए अछि आ एकर शीर्षक सर्वथा उपयुक्त अछि।[१]
मैथिली गीत
[सम्पादन करी]भगव देखि (१३क, २)
चाँन्दन वेन्दा लाइ सुललाट ( १४क, ३)
गाल पचकि लवि गेलओक आ (१६क, ७ )
कके बिहुसि हसि लेसि परान (१६ क,७ )
अनङ्गसेना तसु देखि रे आ (१७क, ९)
सबइ चाहि बड़ सोति बोलाइ (२०ख, १७)
सन्दर्भ सामग्रीसभ
[सम्पादन करी]- 1 2 3 4 5 प्रेमर्षि, धीरेन्द्र, "७०० वर्ष पाको मैथिली नाट्यकृति" [७०० वर्ष पुरान मैथिली नाट्यकृति], अन्नपूर्ण पोस्ट (नेपालीमे), अन्तिम पहुँच २०२३-०४-२२।
- ↑ "Maithili Language and Literature Records in Nepal" [नेपालमे संरक्षित मैथिली भाषा आ साहित्यसभ], ट्रस्ट मी (अंग्रेजीमे), अन्तिम पहुँच २०२३-०४-२२।
- ↑ जनकपुरी, रोशन (२०२१-१२-१२), "मैथिली भाषामा प्रगतिवादी साहित्येतिहासको सामान्य अवलोकन", नेपाली साहित्य घर (नेपालीमे), मूलसँ २०२३-०४-२२ मे सङ्ग्रहित, अन्तिम पहुँच २०२३-०४-२२।
|dead-url=प्यारामिटर ग्रहण नहि कएल (सहायता) - ↑ झा, प्रकाश, "मैथिलीक प्राचीन नाटकक मंचन : समस्या आ उपलब्धि", गुञ्जन श्री (मैथिलीमे), मूलसँ २०२३-०४-२२ मे सङ्ग्रहित, अन्तिम पहुँच २०२३-०४-२२।
|dead-url=प्यारामिटर ग्रहण नहि कएल (सहायता)