विद्यापति

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विद्यापति
Statue of Maha Kavi Kokil Vidyapati.jpg
जन्म १३५२
मधुबनी, वर्तमान-भारत[१]
मृत्यु १४४८
जनकपुरधाम, वर्तमान-नेपाल[२][३]
निवास पूरान नेपाल [४]
पेशा लेखक , कवी
भाषा मैथिली, नेपाली, बंगाली, उडिया
राष्ट्रियता भारतीय आ नेपाली
नस्ल मैथिल

विद्यापति (जन्म:१३५२-१४४८) मैथिली साहित्यके आदि कवि अछि । विद्यापतिक जन्म १३५२ ई.क लगातिमे बिस्फी गाममे भेलन्हि । हिनकर परवर्ती सभ आइ-काल्हि सौराठ गाममे रहैत छथि। एकर प्रमाण निम्न गप सभसँ लगैत अछि। १३९४-९६ क बीच कएल पदक समर्पण गियासौद्दीन आजमशाह आ नसरत शाहकेँ कएल गेल अछि। देव सिंहक आदेश सँ १४०० ई.क लगातिमे ई “भू-परिक्रमा लिखलन्हि। १४०२-०४ क बीच कीर्तिलताक रचना कीर्ति सिंहक राज्यकालमे कएलन्हि। १४०९-१४१५ ई.क बीच कीर्तिपताकाक रचना। पूर्वार्ध १४०९ क लगातिमे मे - हरि केलि अर्जुन सिंहक कीर्तिगाथासँ सम्बन्धित अछि आ उत्तरार्ध १४१५ क लगातिमे शिवसिंहक युद्ध आ तिरोधानसँ सम्बद्ध अछि। विद्यापति जीक आदेशसँ १४१० ई. मे “काव्य प्रकाश विवेक”क प्रतिलिपि बनाओल गेल। १४१० ई.मे शिवसिंहक राज्यारोहण भेल आ एहि उपक्ष्यमे विद्यापतिकेँ बिसपीक दानपत्र प्रदान कएल गेल। शिवसिंहक राज्यकाल १४१०-१४ ई. धरि रहल आ एहि अवधिमे गोरक्ष विजय नाटक, पुरुष-परीक्षा आ मैथिली-पदावलीक अधिकांश भागक रचना भेल। १४१६ ई. क लगाति पुरादित्यक आदेशसँ लिखनावलीक निर्माण भेल। १४२८ ई. मे भागवत पुराणक विद्यापति लिखित प्रतिलिपि पूर्ण भेल। १४२७-१४३९ ई. मे पद्म सिंहक महारानी विश्वास देवी क आदेशसँ शैव सर्वस्वसार, शैव सर्वस्वसार प्रमाण भूत संग्रह आ गंगा वाक्यावलीक रचना, १४५३-६० ई.क लगाति राजा नरसिंह दर्पनारायण आ रानी धीरिमतिक समयमे विभागसार, व्याडिभक्ति तरंगिणी आ दानवाक्यावलीक रचना भेल। १४५५ ई. क लगाति भैरव सिंहक अनुज्ञासँ “दुर्गाभक्ति तरंगिणी”क रचना भेल आ १४६१ ई. मे श्री रूपधर हिनकासँ छात्र रूपमे अध्ययन कएलन्हि। १४६५ ई.क आसपास हिनकर मृत्यु भेल होएतन्हि, जनश्रुति अछि जे ई दीर्घायु भेल छलाह आ सए बरखक आयु प्राप्त कएने छलाह।आधुनिक मैथिली साहित्यके लेखन आ विस्तारमें हुनकर बहुत बड्का योगदान रहल अछि । मैथिली भाषा आर साहित्यमें हिनकर योगदानके नेपाल आर भारत दुनु देशमें उच्च सम्मान करएत अपन-अपन देशके चिट्ठी टिकटमें हुनकर तस्विर अङ्कीत केनए अछि ।

हिनकर रचनामे एक बेर जगज्जननी सीताक चरचा एहि रूपमे आएल अछि

इन्द्रस्येव शची समुज्जवलगुणा गौरीव गौरीपतेः कामस्येव रतिः स्वभावमधुरा सीतेव रामस्य या। विष्णोः श्रीरिव पद्मसिंहनृपतेरेषा परा प्रेयसी विश्वख्यातनया द्विजेन्द्रतनया जागर्ति भूमण्डले॥9॥

उपर्युक्त पद्य विद्यापतिकृत शैवसर्वस्वसारक प्रारम्भक नवम श्लोक छी। एकर अर्थ अछि- उत्कृष्ट गुणवती, मधुर स्वभाववाली, ब्राह्मण-वंशजा, नीति-कौशलमे विश्वविख्यातओ’ महारानी विश्वासदेवी सम्प्रति संसारमे सुशोभित छथि, जे पृथ्वी-पति पद्मसिंहकेँ तहिना प्रिय छलीह जहिना इन्द्रकेँ शची, शिवकेँ गौरी, कामकेँ रति , रामकेँ सीता ओ’ विष्णुकेँ लक्ष्मी॥9॥

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सन्दर्भ सूची[सम्पादन करी]

बाहिरक स्रोत[सम्पादन करी]